
बिहार के शेखपुरा जिले के छोटे से गांव गुणहेसा में रहने वाली कृष्णा देवी ने अपनी कला के दम पर न केवल आर्थिक स्वतंत्रता हासिल की है, बल्कि कई महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन गई हैं। सीमित संसाधनों और कम पढ़ाई के बावजूद जीविका से जुड़कर उन्होंने तंजौर पेंटिंग को बिहार में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
चेन्नई में ली गई ट्रेनिंग ने उन्हें इस बारीक कला का विशेषज्ञ बना दिया। प्लाईवुड पर कपड़ा चढ़ाकर चूना-गोंद से उभरी मूर्तियां बनाना, रंग भरना और 22 कैरेट सोने की परत चढ़ाना—यह सब 15 दिनों की मेहनत मांगता है। बड़े चित्रों में और समय लगता है।
दिल्ली जैसे शहरों में उनकी भगवान कृष्ण, राम, विष्णु आदि की पेंटिंग्स की भारी मांग है। बिहार से चार लाख रुपये का कारोबार हो चुका। प्रदर्शनियों के निमंत्रण पत्रों के साथ यात्रा-रहने की व्यवस्था भी होती है।
पति प्रवीण कुमार बताते हैं कि 2016 से जीविका से जुड़े। कोरोना के कारण चेन्नई से लौटे तो जीविका ने कला सराही, मेलों में जगह दी और लोन उपलब्ध कराया। नोएडा हाट में पुरस्कार मिला। शुरुआती मजाक अब प्रशंसा में बदल गया।
तमिलनाडु से कच्चा माल लाना पड़ता है, लेकिन हार नहीं मानी। पटना, भुवनेश्वर, इंदौर जैसे मेले उनकी पहचान बने। यह कहानी बताती है कि सरकारी सहयोग से ग्रामीण महिलाएं कला के बल पर सशक्त हो सकती हैं।