
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से ठीक दो सप्ताह पहले देश में उबाल छा गया है। राजनीतिक दल, पर्यवेक्षक, मीडिया और नागरिक संगठन प्रशासन की नाकामियों व नीतिगत चूक पर खुलकर बोल रहे हैं। राजनीतिक कलह, धार्मिक कट्टरता, आर्थिक अनिश्चय और संकुचित नागरिक स्थान गंभीर खतरे की घंटी बजा रहे हैं।
ढाका ट्रिब्यून के गुरुवार के संपादकीय ने मीडिया स्वतंत्रता पर संकट के संकेतों को रेखांकित किया। हालिया मीडिया संस्थानों पर हमलों का हवाला देकर अखबार ने कहा कि बिना सेंसरशिप व दबाव के मीडिया ही जनता को जागरूक रखता है और बहस को मजबूत बनाता है।
देशी प्रेस अर्थव्यवस्था की मंदी, उदीयमान धार्मिक असहिष्णुता, आक्रामक राजनीति, लैंगिक असमानता, मीडिया अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ती चुनौतियों को उजागर कर रहा है।
रिपोर्टें ठप विकास, उछालती महंगाई व नीतियों की बेदम प्रभावशीलता पर चिंता जताती हैं, जिससे परिवार व व्यापारिक हलकों में बेचैनी तेज हो रही है।
प्रधान सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने दस्तावेजी धोखाधड़ी पर चेताया, ढाका ट्रिब्यून के अनुसार बांग्लादेश को ‘विश्व धोखा चैंपियन’ करार देते हुए विदेशी परेशानियों का जिक्र किया।
महिलाओं के संदर्भ में राजनीतिक वादे व हकीकत की खाई उभर रही है। कार्यकर्ता सार्वजनिक सुरक्षा, समान वेतन, चाइल्डकेयर, न्याय पहुंच व राजनीतिक भूमिका पर सवाल ठोंक रहे हैं।
डेली स्टार ने 20 महिलाओं के साक्षात्कारों से बताया कि हिंसा, नागरिक संकुचन, बेरोजगारी, आर्थिक डर, स्वास्थ्य उपेक्षा व 423 सिफारिशों की अनदेखी से वादों का खोखलापन साफ है।
चुनाव प्रचार में धार्मिक बयानबाजी व पहचान राजनीति हावी है, अल्पसंख्यक हिंसा जैसे दीपू दास हत्याकांड सुर्खियां बटोर रहे हैं।