
नई दिल्ली की साकेत अदालत ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा दायर 25 वर्ष पुराने मानहानि मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना को बरी कर दिया है। यह फैसला सक्सेना के लिए बड़ी कानूनी जीत साबित हुआ है।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी राघव शर्मा ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता पाटकर आरोपी के विरुद्ध अपना पक्ष संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहीं। अदालत ने आईपीसी की धारा 500 के तहत सक्सेना को निर्दोष घोषित किया।
कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो दर्शाए कि सक्सेना ने व्यक्तिगत रूप से पाटकर के खिलाफ कोई विज्ञापन प्रकाशित किया हो। 2000 का विवादित विज्ञापन एनबीए संगठन और कुछ व्यक्तियों पर केंद्रित था, न कि मेधा पाटकर पर।
यह मुकदमा गुजरात से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली स्थानांतरित हुआ था। तब सक्सेना अहमदाबाद में काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे। बाद में उन्होंने भी पाटकर पर मानहानि का केस किया, जिसमें उन्हें सजा और मुआवजा मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने पाटकर की सजा निलंबित की, लेकिन दोष बरकरार रखा। यह फैसला नर्मदा आंदोलन की आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई बहस छेड़ सकता है।