
मुंबई। विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ ने न सिर्फ दर्शकों के दिलों में जगह बनाई, बल्कि विवादों का भी भंवर झेला। ‘फाइल्स’ ट्रायलॉजी की तीसरी फिल्म होने के नाते यह 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखली दंगों और बंटवारे के दौरान हिंदू नरसंहार की अमानवीय कहानी बयां करती है।
फिल्म निर्माण की शुरुआत ही दुखद रही। शूटिंग से ठीक पहले प्रोडक्शन डिजाइनर रजत पोद्दार का आकस्मिक निधन हो गया। विशाल सेट बन रहे थे, लेकिन टीम ने हार न मानी। रजत के नाम पर समर्पित होकर सेट पूरे किए और शूटिंग खत्म की।
2025 विवेक के लिए संघर्षपूर्ण साल साबित हुआ। सीबीएफसी से सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद रिलीज पर कोलकाता में हमले, धमकियां और पश्चिम बंगाल में अनौपचारिक प्रतिबंध ने रास्ता रोका। थिएटर मालिकों पर दबाव डाला गया, पुलिस और राजनीतिक शक्तियों की धमकियों से मल्टीप्लेक्स भी पीछे हटे।
देश की बड़ी चेनें भी बंगाल में फिल्म नहीं चला पाईं। मीडिया, कार्यकर्ताओं और संगठनों के विरोध के बावजूद रिलीज रुकी। विवेक कहते हैं, ‘यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चुनौती है। जो संस्थाएं रक्षा करें, वे नाकाम रहीं।’
फिर भी, जहां फिल्म दिखी, वहां दर्शकों में जागरूकता आई। मध्यम वर्ग, किसान, मजदूर, पत्रकारों ने समर्थन दिया। विवेक की किताब ‘अर्बन नक्सल’ के संदर्भ में वे कहते हैं, ऐसी ताकतों के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। नई पीढ़ी को सतर्क होना होगा। फिल्म ने साबित किया, सत्य दबाना नामुमकिन है।