
वाशिंगटन के प्रतिष्ठित नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने दशकों पुराने अपराध को सुधारते हुए तमिलनाडु के मंदिरों से चुराई गईं तीन ऐतिहासिक कांस्य मूर्तियां भारत को सौंपने का ऐलान किया है। इनमें चोल काल की भगवान शिव नटराज मूर्ति (लगभग 990 ई.), 12वीं शताब्दी की सोमस्कंद मूर्ति और 16वीं शताब्दी की विजयनगर काल की संत सुंदरर विद परावई शामिल हैं।
ये मूर्तियां दक्षिण भारत की कांस्य कला की अनमोल धरोहर हैं, जो कभी मंदिरों में धार्मिक जुलूसों की शान बढ़ाती थीं। स्मिथसोनियन संस्थान की लंबी जांच के बाद यह फैसला आया, जिसमें पांडिचेरी के फ्रेंच इंस्टीट्यूट के फोटो अभिलेखागार से 1956-59 की तस्वीरों में इनकी मौजूदगी पुष्ट हुई।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अवैध हटाने की पुष्टि की। दो मूर्तियां पूरी तरह लौटेंगी, जबकि शिव नटराज दीर्घकालिक ऋण पर अमेरिका में रहेगी। इसे विशेष प्रदर्शनी में रखा जाएगा, जहां इसके चोरी, बिक्री और वापसी की पूरी कहानी बताई जाएगी।
म्यूजियम निदेशक चेज एफ रॉबिन्सन ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत की जिम्मेदारीपूर्ण देखभाल उनकी प्राथमिकता है। भारत सरकार का आभार जताते हुए उन्होंने इस समझौते को नैतिकता का प्रतीक बताया।
शिव नटराज तिरुतुराइपुंडी के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर की थी, जो 2002 में फर्जी कागजातों से खरीदी गई। बाकी दो आर्थर सैकलर के दान से आईं, जिनकी जड़ें अलत्तूर और वीरसोलापुरम के मंदिरों से जुड़ी हैं।
प्रोवेनेंस जांच में दस्तावेजों, पुरानी तस्वीरों और भौतिक परीक्षण से इतिहास उजागर हुआ। भारत की लंबी लड़ाई ने एक और जीत हासिल की, जो वैश्विक संग्रहालयों के लिए मिसाल बनेगी। स्मिथसोनियन दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय परिसर है, जहां लाखों पर्यटक आते हैं।