
ढाका में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले जमात-ए-इस्लामी की दोहरी रणनीति सामने आ गई है। एक तरफ पार्टी सत्ता हासिल करने पर शरिया लागू न करने का भरोसा दिलाती है, वहीं उसके शीर्ष नेता टीवी बहसों में बेखौफ होकर शरिया कानून की वकालत कर रहे हैं। इनमें कई चुनावी उम्मीदवार भी शामिल हैं।
जमीनी पायदान पर कार्यकर्ता ‘दारिपल्ला’ चुनाव चिह्न को वोट देने को धार्मिक फर्ज ठहरा रहे हैं। कुछ इसे जन्नत का रास्ता बता रहे हैं। बुधवार को प्रकाशित एक प्रमुख रिपोर्ट ने इस विरोधाभास को उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जमात का नाम ही इस्लाम से जुड़ा है और लंबे अर्से से वह अल्लाह के कानून की मांग करती रही है। कोर समर्थक शरिया की उम्मीद लगाए हैं, लेकिन सत्ता की दौड़ में यह जोखिम भरा साबित हो सकता है। इसलिए पार्टी अस्पष्ट रुख अपनाए हुए है।
यह रणनीतिक अस्पष्टता स्वीकार्य नहीं। जमात को स्पष्ट बताना चाहिए कि सत्ता में शरिया लागू करेगी या नहीं, और यदि हां तो किस रूप में। अवामी लीग-बीएनपी से अलग, यहां वैचारिक लड़ाई है। संविधान के तहत ऐसी पार्टी का हक?
चुनाव करीब हैं। शरिया पर सफाई दें जमात, वरना यह दोगलापन उसकी ईमानदार शासन की बात को झुठला देगा। यह उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। मतदाता सूझबूझ से चुनें।