
हिंदी सिनेमा के दिग्गज निर्देशक सुभाष घई ने अपने लंबे करियर में उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी फिल्में न केवल मनोरंजन का साधन बनीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और भावनाओं को भी प्रभावी ढंग से पेश किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने प्रारंभिक दिनों से लेकर आज के डिजिटल दौर तक के बदलावों पर विस्तार से चर्चा की।
55 वर्ष पूर्व पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में अभिनय की शिक्षा लेते हुए घई ने विश्व सिनेमा का गहन अध्ययन किया। ‘मैंने न केवल भारतीय बल्कि वैश्विक फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण की, जो मेरे करियर की मजबूत आधारशिला बनी,’ उन्होंने कहा।
शिक्षा के बाद उन्होंने जल्दबाजी में निर्देशन नहीं अपनाया। तीन वर्ष अभिनय, तीन लेखन और तीन निर्देशन सहायक के रूप में बिताए। ‘हर विभाग की गहरी समझ ही सफलता की कुंजी है,’ उनका मानना है। इसी अनुभव से उन्होंने 18-19 फिल्में बनाईं, प्रोडक्शन हाउस को शेयर बाजार में उतारा, वितरण और सिनेमाघरों में कदम रखा।
मुंबई पहुंचने वाले युवाओं की परेशानियों को देखते हुए घई ने फिल्म स्कूल स्थापित किया। ‘यहां 2-3 वर्षों में विशेषज्ञों से प्रशिक्षण, प्रैक्टिस और नेटवर्किंग होती है, जिससे वे उद्योग में सहज प्रवेश कर पाते हैं।’
उद्योग के परिवर्तनों पर उन्होंने कहा, ‘बदलाव स्वाभाविक है। हर 30 वर्ष में नई पीढ़ी अपनी सोच लाती है। 80-90 के दशक के दर्शक आज के जागरूक दर्शकों से भिन्न थे, इसलिए कहानियां और प्रस्तुति बदली।’
डिजिटल युग ने नए द्वार खोले। ‘ओटीटी, वेब सीरीज और टीवी ने युवा कलाकारों को अपार अवसर दिए। सिनेमा अब अकेला नहीं, बल्कि बहुआयामी हो गया है।’ घई का अनुभव हिंदी सिनेमा की जीवंतता को दर्शाता है।