
मुंबई के मनोरंजन जगत में हाल के दिनों शिफ्ट टाइमिंग को लेकर जो बहस छिड़ी है, वह दीपिका पादुकोण की 8 घंटे की शिफ्ट की मांग से और तेज हो गई। लेकिन वरिष्ठ अभिनेता दीपक पराशर का मानना है कि यह मुद्दा सतही है। 46 वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने उद्योग की कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया और संघर्षशील कलाकारों के लिए उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की मांग की।
दीपिका का पक्ष सही है, लेकिन यह छोटे कलाकारों तक नहीं पहुंचता, जिन्हें रोज काम ढूंढना पड़ता है। बड़े सितारे बॉक्स ऑफिस की ताकत रखते हैं, इसलिए उनकी मांगें मान ली जाती हैं। निचले पायदान पर मौजूद अभिनेता इन बहसों से अप्रभावित रहते हैं। उद्योग इन्हीं चंद सितारों के चारों ओर घूमता है।
क्या कभी ये बड़े नाम जरूरतमंदों के लिए सड़क पर उतरेंगे? पराशर ने सवाल उठाया। आरामदायक जीवन जीने वाले शायद ही ऐसा जोखिम लें। इसी कारण मजबूत आंदोलन नहीं बन सका। अब सीनियर कलाकार आगे आ रहे हैं—पूनम ढिल्लों, पद्मिनी कोल्हापुरे, उपासना सिंह जैसे दिग्गज एकजुट होकर बदलाव लाने को तैयार हैं।
पराशर ने कोरोना काल की मदद याद की, जब ऋतिक रोशन, सोनू सूद, सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार ने जरूरी सहायता दी। लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। आज टीवी और ओटीटी के विस्तार से कलाकार बंट गए हैं, एक मजबूत एसोसिएशन की कमी है।
समाधान केवल राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर संभव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अरुण गोविल से ठोस कदम की उम्मीद है। यह पहल उद्योग को नई दिशा दे सकती है, जहां हर कलाकार सम्मान पाए।