
मुंबई के दिग्गज फिल्म निर्माता सुभाष घई, जिनकी फिल्में ग्लैमर, ड्रामा और संदेशपूर्ण कहानियों का अनोखा संगम हैं, ने भारतीय सिनेमा के बदलते परिदृश्य पर अपनी राय रखी। एक विशेष बातचीत में उन्होंने फिल्म निर्माण, शिक्षा, रीमेक गानों के चलन और एक्शन फिल्मों की लोकप्रियता पर विचार साझा किए।
50 वर्षों के सिनेमाई सफर और 25 वर्षों की शिक्षण अनुभव के साथ घई ने अपने संघर्षमय सफर को याद किया। ’55 साल पहले मैं पुणे के एफटीआईआई में छात्र था, जहां विश्व सिनेमा की गहराई समझी। फिर अभिनय, लेखन, निर्देशन और निर्माण की दुनिया में कूद पड़े।’
18-19 फिल्मों में से 14-15 सुपरहिट रहीं। इसके बाद उन्होंने कंपनी को आईपीओ में ले जाकर वितरण, प्रदर्शन और व्हिसलिंग वुड्स फिल्म स्कूल की स्थापना की। ‘मुंबई आकर कई युवा भटक जाते हैं। स्टूडियो, संपर्क और टैलेंट दिखाने का तरीका नहीं पता। हमारा स्कूल 2-3 साल की ट्रेनिंग से उन्हें इंडस्ट्री के लिए तैयार करता है।’
रीक्रिएट गानों पर घई बोले, हर युग में नए सर्जक उभरते हैं—फाल्के से गुरु दत्त, प्रकाश मेहरा तक। ‘सिनेमा समाज का दर्पण है। डिजिटल दौर में ओटीटी ने छोटी-बड़ी कहानियों को जगह दी है।’
एक्शन फिल्मों के बोलबाले पर उन्होंने कहा, ‘हर 20-30 साल में ट्रेंड बदलता है—60 के दशक में पारिवारिक फिल्में, 70 में अमिताभ एक्शन, 90 में रोमांस। दर्शक नयापन चाहते हैं।’ घई की ये बातें सिनेमा के भविष्य को दिशा देती हैं।