
बांग्लादेश में राजनीतिक मंचों पर धर्म का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, खासकर चुनावी दौर में। पार्टियां और नेता जन्नत के वादे और शरिया कानून लागू करने का लालच देकर वोट हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति देश की धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए खतरा बनती जा रही है।
एक प्रमुख अध्ययन के अनुसार, लंबे समय से कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था, धार्मिक उग्रवाद का प्रभाव और आंतरिक-अंतरराष्ट्रीय कट्टर ताकतों ने इस स्थिति को जन्म दिया है। चुनावी सभाओं में नेता धार्मिक परिधान धारण कर मंच सजाते हैं, पुरुष टोपी पहनते हैं तो महिलाएं सिर ढकती हैं।
जमात-ए-इस्लामी पर चुनाव चिन्ह के नाम पर जन्नत का टिकट बांटने के आरोप लगे हैं, जबकि बीएनपी नेता इसे अंधेरे युग की चाल बताते हैं। लेकिन कोई भी दल पीछे नहीं। 1991 में बीएनपी ने अवामी लीग के सत्ता में आने पर अजान बंद होने और मस्जिदों में हिंदू रिवाज शुरू होने का डर दिखाया था।
शेख हसीना ने 1996 में दरगाह से प्रचार शुरू किया, काले हेडस्कार्फ में। पिछले पांच चुनावों में अवामी लीग ने भी इसी फॉर्मूले का सहारा लिया। इस्लामिक मूवमेंट बांग्लादेश ने शरिया पर मतभेद से गठबंधन तोड़ा।
फरवरी चुनाव में 51 दल, 1981 उम्मीदवार, जिनमें 36 प्रतिशत इस्लामी दलों से। यह 2024 के 9.5 प्रतिशत से कहीं ज्यादा। टीआईबी रिपोर्ट देश की राजनीति और प्रशासन में इस्लामी प्रभाव की ओर इशारा करती है।
देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर लौटना होगा, वरना लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा। सुधारों की जरूरत है ताकि राजनीति मुद्दों पर केंद्रित हो।