
राष्ट्रपति भवन में एक ऐतिहासिक क्षण आया जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ग्रंथ कुटीर का उद्घाटन किया। यह अनूठा पुस्तकालय भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं—तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, उड़िया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली—में 2,300 पुस्तकों और पांडुलिपियों का भंडार समेटे हुए है।
ग्रंथ कुटीर हमारी सांस्कृतिक, दार्शनिक और साहित्यिक धरोहर को जीवंत रूप देता है। महाकाव्यों से लेकर दर्शन, विज्ञान, इतिहास और भक्ति रचनाओं तक, यहां भारत का संविधान भी इन भाषाओं में उपलब्ध है। करीब 50 दुर्लभ पांडुलिपियां ताड़पत्र, छाल और कपड़े पर उत्कीर्ण हैं।
केंद्र-राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय, संस्थान और दानदाता मिलकर इसकी रचना कर चुके हैं। शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालयों का सहयोग और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की विशेषज्ञता इसे मजबूत बनाती है।
यह प्रयास औपनिवेशिक मानसिकता को चुनौती देता है, विविधता में एकता को प्रज्वलित करता है तथा ज्ञान भारतम मिशन के तहत पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित करता है।
पहले यहां ब्रिटिश सामग्री थी, जो अब स्थानांतरित होकर ऑनलाइन उपलब्ध है। सर्किट-1 दौरे में पर्यटक इसे देख सकेंगे, पोर्टल से पढ़ सकेंगे, शोधार्थी प्रवेश पा सकेंगे।
प्राचीन ग्रंथ जैसे वेद, गाथासप्तशी, विनय पिटक, चर्यापद, तिरुक्कुरल आदि यहां सुरक्षित हैं।
उद्घाटन के बाद राष्ट्रपति ने कहा, ‘ये भाषाएं हमारी संस्कृति की जड़ें हैं। योग, आयुर्वेद, गणित इन्हीं से विश्व को मिले। पाणिनि, आर्यभट्ट जैसे महान कार्य आज भी प्रासंगिक हैं।’ उन्होंने संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास, युवाओं को प्रोत्साहन और संग्रह वृद्धि का आह्वान किया। ग्रंथ कुटीर राष्ट्रपति भवन की सतत पहल का प्रतीक बनेगा।