
संजय लीला भंसाली की नेटफ्लिक्स सीरीज ‘हीरामंडी’ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, लेकिन इसमें एक गीत ऐसा है जो इतिहास की गहराइयों से जुड़ा है। ‘सकल बन’ को आलमजेब की नथ उतराई के दौरान फिल्माया गया, जो बसंत पंचमी के पीले रंगों और प्रकृति की नई ताजगी को दर्शाता है।
गीत के बोल प्रकृति के जादू को उकेरते हैं- सरसों के खेत फूल रहे, बन-वन सरसों से लाल, अम्बुआ फूटे, टेसू खिले, कोयल डार-डार बोले, गोरी सिंगार करे। हीरामंडी में पीले परिधानों में नर्तकियां बाजार की नई तवायफ का स्वागत करती नजर आती हैं, जहां उसे अपना ‘राजा’ भी मिलता है।
लेकिन इस गीत की जड़ें 14वीं शताब्दी में हैं। सूफी कवि अमीर खुसरो ने इसे अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया के लिए रचा। भतीजे की मौत से टूटे गुरु ने खाना-पीना छोड़ दिया था। बसंत पंचमी पर खुसरो ने पीली वस्त्रों वाली महिलाओं को सरस्वती पूजा करते देखा। उन्होंने खुद पीला पहना, सरसों के फूल लिए और ‘सकल बन’ गाकर गुरु को हंसाया।
तब से दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह में हर बसंत पर सूफी उत्सव होता है, जहां ये गीत गुरु-शिष्य प्रेम और बसंत की उमंग का प्रतीक बनते हैं। भंसाली ने इसे बाजार की रस्म से जोड़ा, जो सदियों पुरानी भावनाओं को जीवंत करता है।
यह गीत हमें सिखाता है कि संगीत दुख हराकर खुशियां ला सकता है, चाहे दरगाह हो या स्क्रीन।