
बॉलीवुड में नेपोटिज्म का मुद्दा हमेशा सुर्खियों में रहता है। स्टार संतानों को बड़े प्रोजेक्ट्स और जोरदार प्रमोशन आसानी से मिल जाते हैं, वहीं बाहरी कलाकारों को कड़ी मेहनत के बाद भी संघर्ष झेलना पड़ता है। कई फिल्मी खानदानों ने इंडस्ट्री पर लंबे समय तक राज किया है।
आलिया भट्ट, रणबीर कपूर, ऋतिक रोशन जैसी हस्तियां चमकीं तो कई स्टार किड्स असफल भी साबित हुए। बाहर से आए कलाकार अक्सर शिकायत करते हैं कि उन्हें सही मौके नहीं मिलते। ऐसे में विवेक रंजन अग्निहोत्री ने नेपोटिज्म को कुम्हार और मटके के उदाहरण से समझाया।
उन्होंने कहा कि नेपोटिज्म अपने आप में नकारात्मक नहीं है। अगर डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बने या कारीगर का पुत्र उसी कला में निपुण हो, तो इसमें क्या बुराई? कुम्हार का बेटा यदि बेहतरीन मटके गढ़ ले, तो उसे मौका देना जायज है।
लेकिन विवेक का मानना है कि जब परिवार का नाम टैलेंट पर भारी पड़ता है, तब यह जहर बन जाता है। अगर कुम्हार का बेटा मटका बनाने में नाकाम रहता है, हर बार चीज टूट जाती है, फिर भी उसे जबरन जिम्मेदारी सौंपी जाती है। इस दौरान लाइन में खड़े अन्य कुशल कारीगरों को अवसर से वंचित रखा जाता है। संसाधन सिर्फ अयोग्य पर खर्च होते हैं।
यह दृष्टिकोण नेपोटिज्म बहस को नई दिशा देता है। विवेक की बात इंडस्ट्री को सोचने पर मजबूर करती है कि परिवारवाद को बढ़ावा दें, लेकिन मेरिट को कभी दबाएं नहीं। बॉलीवुड का भविष्य कुशलता पर टिका है।