
बॉलीवुड की उन चुनिंदा फिल्मों में शोले का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जो अपनी कहानी, पात्रों और डायलॉग्स से दर्शकों के दिलों पर राज करती है। निर्देशक रमेश सिप्पी ने 1975 में इस महाकाव्य को परदे पर उतारा, जिसके डायलॉग्स आज भी हर घर में गूंजते हैं। ‘कितने आदमी थे?’, ‘जो डर गया, समझो मर गया’ और ‘अब तेरा क्या होगा कालिया’ जैसे संवाद हिंदी सिनेमा की धरोहर बन चुके हैं।
रमेश सिप्पी का जन्म 23 जनवरी 1937 को कराची में हुआ। पिता जीपी सिप्पी प्रसिद्ध निर्माता थे। विभाजन के बाद मुंबई शिफ्ट होने पर रमेश ने बचपन से फिल्मी माहौल में पलना शुरू किया। छह साल की उम्र में शहंशाह में बालकलाकार बने, लेकिन निर्देशन की राह चुनी। 1971 की अंदाज से डेब्यू किया, जिसमें शम्मी कपूर-हेमा मालिनी चमके। 1972 की सीता और गीता ने उन्हें स्टार निर्देशक बना दिया।
शोले में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जया भादुड़ी, हेमा मालिनी, संजीव कुमार और अमजद खान जैसे सितारे थे। गब्बर का किरदार अमर हो गया। शुरुआती आलोचना के बावजूद फिल्म पांच साल चली। सिप्पी के अन्य हिट्स में शान, शक्ति, सागर और अकेला शामिल हैं। 2013 में पद्मश्री मिला। उनकी एकेडमी नए टैलेंट को निखार रही है।
सिप्पी की डायलॉग्स की ताकत उनकी सादगी और गहराई में है। वे जीवन की सच्चाइयों को छूते हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। शोले की यादें हमें सिप्पी के जादू की गवाही देती रहेंगी।