
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पीठ दर्द एक आम समस्या बन चुकी है, जिसमें स्लिप डिस्क सबसे बड़ा दोषी है। आयुर्वेद के अनुसार, रीढ़ की हड्डियों के बीच की मुलायम चट्टानें अपनी जगह से सरक जाती हैं, जिससे नसें दबती हैं और पीठ व पैरों में तेज दर्द, झुनझुनी या कमजोरी महसूस होती है। इसे कटिग्रह कहा जाता है, जो वात दोष के असंतुलन से उपजता है।
वात जब बिगड़ता है, तो शरीर की लचीलापन कम हो जाता है, जोड़ सख्त हो जाते हैं। आधुनिक जीवनशैली इसमें योगदान देती है—लंबे समय तक कुर्सी पर झुककर काम करना, भारी बोझ गलत तरीके से उठाना, मोटापा और चोटें डिस्क को कमजोर बनाती हैं। उम्र बढ़ने पर डिस्क स्वाभाविक रूप से पतली पड़ जाती हैं।
बचाव सरल है। हर 30-40 मिनट में उठकर टहलें। भुजंगासन, मकरासन, शवासन जैसे योगासन रीढ़ को मजबूत बनाते हैं। आयुर्वेदिक तेलों से मालिश और गर्म सेंक दर्द दूर करते हैं। वात संतुलित रखने के लिए घी, तिल, गर्म भोजन लें। प्राणायाम से श्वास नियंत्रित करें।
इन आदतों से न केवल स्लिप डिस्क टल सकती है, बल्कि स्वस्थ रीढ़ जीवन भर साथ देगी। आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें।