
नई दिल्ली, 22 जनवरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी 2015 को शुरू किया गया ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान आज पूरे देश में एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुका है। इसके 11 वर्ष पूरे होने पर गुजरात के ‘कन्या केलवणी’ और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ की सफलता याद दिलाई जा रही है, जिसने बेटियों की शिक्षा की तस्वीर ही बदल दी।
2001 में जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तो बेटियों की शिक्षा बदहाली के आंकड़ों से जूझ रही थी। महिला साक्षरता दर महज 57.80 प्रतिशत थी। 38.92 प्रतिशत लड़कियां स्कूल बीच में छोड़ देती थीं। 42 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय तक उपलब्ध नहीं थे।
मोदी जी ने तुरंत ‘कन्या केलवणी योजना’ और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ शुरू किए। इनका मकसद था समाज की मानसिकता बदलना। भीषण गर्मी में मुख्यमंत्री स्वयं गांव-गांव भ्रमण करते। उनके मंत्रिमंडल और 634 वरिष्ठ अधिकारी – 119 आईएएस, 94 आईपीएस, 68 आईएफएस सहित – हर साल तीन दिनों तक 18 हजार से अधिक गांवों में पहुंचे। घर-घर जाकर उन्होंने माता-पिता से अपील की, ‘अपनी बेटियों को स्कूल भेजें।’
इसके साथ ही बुनियादी ढांचे पर जोर दिया गया। 7 वर्षों में 42,371 लड़कियों के लिए शौचालय बनाए गए, 58,463 नई कक्षाएं तैयार हुईं, 22,758 स्कूलों में बिजली पहुंची। मोदी जी ने अपने सारे उपहार नीलाम कर दिए और पूरी सैलरी दान कर दी।
दाखिले को उत्सव बना दिया गया। ढोल-नगाड़े, रथ यात्राएं, गांवों में हर्षोल्लास। कन्या केलवणी से 55,181 लड़कियों को आर्थिक सहायता, विद्या लक्ष्मी बॉन्ड 8वीं तक, 3,545 लड़कियों को टैबलेट, सरस्वती साइकिल योजना से लाखों साइकिलें।
परिणाम चमत्कारी – महिला साक्षरता 70.73 प्रतिशत, ड्रॉपआउट दर 7.08 प्रतिशत। गुजरात मॉडल ने साबित किया कि इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है। आज यह राष्ट्रीय आंदोलन बेटियों को सशक्त बना रहा है।