
कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की दुनिया में टीएम कृष्णा एक अनोखा नाम हैं। वे न केवल उत्कृष्ट गायक हैं, बल्कि संगीत को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने वाले कलाकार भी। 22 जनवरी 1976 को चेन्नई में जन्मे कृष्णा ने बचपन से ही संगीत की बारीकियां सीखीं, क्योंकि उनके माता-पिता इस कला के प्रति समर्पित थे। लेकिन उन्होंने इसे कभी सीमित नहीं रखा।
कृष्णा ने शास्त्रीय संगीत में ऊपरी जातियों के वर्चस्व पर सीधी चोट की है। वे दलित और वंचित कलाकारों को मंच दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। पारंपरिक विद्वानों की आलोचना झेलने के बावजूद वे अडिग हैं। उनकी पुस्तक ‘ए साउदर्न म्यूजिक’ दक्षिण भारतीय संगीत की परतें खोलती है, जिसमें जातिगत असमानताओं पर गहरा विश्लेषण है।
पर्यावरण के मोर्चे पर भी सक्रिय, कृष्णा ने एनोर क्रीक के औद्योगिकीकरण के खिलाफ गीत रचे। यह संकरी खाड़ी अब कारखानों के कब्जे में है। ‘पोरंबोक’ शब्द का प्रयोग कर वे सामूहिक भूमि के विनाश को चित्रित करते हैं। क्रीक के बीच खड़े होकर गाए गए इन गीतों में वे विकास की अंधी दौड़ की चेतावनी देते हैं।
कृष्णा शास्त्रीय को लोक से जोड़ते हैं, सवालों को सुरों में पिरोते हैं। उत्तर भारत में ऐसे कलाकार दुर्लभ हैं जो सत्ता को ललकारें। उनकी कला समाज को जागृत करने का शक्तिशाली हथियार है।