
नई दिल्ली, 21 जनवरी। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक नीति ने वैश्विक पटल पर हलचल मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया है कि अमेरिका इस आर्कटिक द्वीप को हासिल कर ही लेगा, कोई दूसरा रास्ता नहीं। लेकिन यूरोपीय संघ इस कदम का पुरजोर विरोध कर रहा है।
रिटायर्ड ब्रिगेडियर अद्वित्य मदान ने नाटो पर इसके प्रभावों को रौशनी डाली। उन्होंने बताया कि नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, ब्रिटेन, नीदरलैंड और जर्मनी जैसे आठ देशों ने कल सैनिक तैनात किए। ‘यह कोई व्यायाम नहीं, बल्कि अमेरिका को चेतावनी है कि ग्रीनलैंड पर कोई ऑपरेशन आसान नहीं होगा।’
ब्रिगेडियर के अनुसार, नाटो के 32 सदस्य देश अमेरिका पर लीडरशिप, कमांड और हथियारों के लिए निर्भर हैं। ‘अमेरिका अगर डेनमार्क पर हमला करेगा तो नाटो खत्म। यूरोप को नई व्यवस्था बनानी पड़ेगी—हथियार आपस में खरीद-बिक्री, कमांड सिस्टम नया।’ 1951 का अमेरिका-डेनमार्क समझौता सैन्य सहायता की इजाजत देता है, लेकिन खतरे की स्थिति में।
रूस-चीन पर बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘कोई औपचारिक खतरा नहीं। वेनेजुएला में ट्रंप का लक्ष्य तेल था, यहां रेयर अर्थ मिनरल्स। ट्रंप व्यापारी हैं, यही उनकी रणनीति।’
यह विवाद नाटो की एकता को चुनौती दे रहा है, यूरोप को स्वावलंबी बनने पर मजबूर कर सकता है।