
डावोस में एक और झटका लगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को, जब स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल न होने का ऐलान कर दिया। फ्रांस और नॉर्वे के बाद स्वीडन तीसरा यूरोपीय देश है जिसने इस प्रस्ताव को साफ इनकार कर दिया।
क्रिस्टर्सन ने पत्रकारों से कहा कि वर्तमान स्वरूप में यह बोर्ड स्वीडन के हितों के अनुरूप नहीं है। नॉर्वे ने मंगलवार को ही उप विदेश मंत्री एंड्रियास मोट्जफेल्ट क्राविक के बयान से साफ कर दिया कि संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों को कमजोर करने वाली किसी भी योजना में हिस्सा नहीं लेंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने विश्व आर्थिक मंच में इसे यूएनएससी का विकल्प बताने से साफ इनकार किया।
रॉयटर्स द्वारा देखे गए ड्राफ्ट के मुताबिक, ट्रंप इस बोर्ड की आजीवन अध्यक्षता करेंगे। शुरुआत गाजा विवाद से होगी, फिर अन्य संघर्षों पर विस्तार। पुतिन और लुकाशेंको जैसे नामों को आमंत्रण ने यूरोप में हलचल मचा दी है। यूनाइटेड किंगडम ने भी संरचना पर सवाल उठाए।
इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू ने हालांकि न्यौता कबूल लिया। उनके कार्यालय ने एक्स पर पुष्टि की कि वे दुनिया के नेताओं वाले इस पीस बोर्ड में शामिल होंगे। लेकिन पहले इजरायल ने तुर्की के हाकन फिदान को शामिल करने पर नाराजगी जताई थी। विदेश मंत्री गिदोन सार इस पर अमेरिकी समकक्ष मार्को रुबियो से बात करेंगे।
अर्जेंटीना, अजरबैजान, बेलारूस, हंगरी, कजाकिस्तान, मोरक्को, यूएई और वियतनाम ने सहमति दे दी है। गाजा योजना के दूसरे चरण में एनसीएजी का गठन हुआ है, जो पुनर्निर्माण और फंडिंग संभालेगा। ट्रंप का बोर्ड और गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड इसका आधार बने हैं।
टाइम्स ऑफ इजरायल के अनुसार, राजनयिकों को डर है कि यह यूएन को कमजोर करेगा। यूरोपीय इनकार ट्रंप की वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था की कोशिश को चुनौती दे रहा है। गाजा के भविष्य पर नजरें टिकी हैं।