
राजस्थान के बांसवाड़ा में छिपा है शक्ति का अनुपम धाम—त्रिपुर सुंदरी मंदिर, जो 900 वर्षों से अधिक पुराना है और 51 शक्तिपीठों में प्रमुख स्थान रखता है। गुप्त नवरात्रि के तीसरे दिन मां त्रिपुर सुंदरी की आराधना का विशेष महत्व है, जो तंत्र-मंत्र-यंत्र की अधिष्ठात्री हैं। यहां काली, सरस्वती और लक्ष्मी के एक साथ दर्शन होते हैं, जिससे भक्तों को त्रिपुर सुंदरी का सच्चा स्वरूप प्राप्त होता है।
श्री यंत्र पर विराजमान मां की मूर्ति असीम तेज से दमकती है, जो साधना को शीघ्र फलदायी बनाती है। यह स्थान 64 योगिनी पीठों में से एक है, जहां तांत्रिक साधनाएं चमत्कारिक परिणाम देती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, सती का पीठासन यहीं गिरा था, जिससे यह शक्तिपीठ बना।
मंदिर का काला पत्थर अयोध्या के राम मंदिर जैसा दुर्लभ है। स्थापना की कथा दिलचस्प है—पांचाल लुहार चांदा भाई ने भिखारिण रूप में आई देवी को नजरअंदाज किया, तो क्रोधित मां ने खदान नष्ट कर दी। क्षमा याचना पर मंदिर और तालाब बनवाए गए। 16वीं शताब्दी में पुनर्निर्माण हुआ, आज भी पांचाल समाज इसका संरक्षण करता है।
बांसवाड़ा से 20 किमी दूर तलवाड़ा के निकट स्थित यह मंदिर वागड़ क्षेत्र की गोद में है, जो अरावली की वादियों, माही नदी—जिसे कलियुगी माही गंगा कहा जाता है—से सुशोभित है। स्कंदपुराण में ‘गुप्त प्रदेश’, राजा भोज के शिलालेखों में ‘स्थली मंडल’ का उल्लेख है। इसे मिनी काशी भी कहते हैं।
प्रतिदिन मां का श्रृंगार दिन के रंगानुसार होता है। गुप्त नवरात्रि सहित हर समय भक्त आते हैं, तंत्र सिद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए। यह मंदिर न केवल पूजा स्थल है, बल्कि शक्ति की जीवंत ऊर्जा का केंद्र है।