
21 जनवरी 2016 को भारतीय कला जगत स्तब्ध रह गया जब 97 वर्षीय महान नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई हमें अलविदा कह गईं। लेकिन उनकी नृत्य कला और जीवन दर्शन आज भी नृत्य प्रेमियों के मन में गूंजता है। हर मुद्रा में छिपी कहानी उनके योगदान को अमर बनाती है।
11 मई 1918 को केरल में जन्मीं मृणालिनी का बचपन स्विट्जरलैंड में बीता, जहां डेलक्रूज स्कूल से उन्होंने पश्चिमी नृत्य सीखा। शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के आशीर्वाद से भारतीय संस्कृति से जुड़ीं। भरतनाट्यम में मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई और कथकली में थाकाज़ी कुंचू कुरुप से दीक्षा लेकर उन्होंने शास्त्रीय नृत्य में अपनी छाप छोड़ी।
परिवार में स्वतंत्रता संग्राम की विरासत थी। डॉ. विक्रम साराभाई से विवाह, स्वतंत्रता सेनानी मां अम्मू, आजाद हिंद फौज की कमांडर बहन लक्ष्मी सहगल। यह पृष्ठभूमि ने उन्हें कला के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां दीं।
अहमदाबाद में दर्पणा एकेडमी स्थापित कर उन्होंने 18 हजार से ज्यादा छात्रों को नृत्य, कठपुतली, नाटक, संगीत और मार्शल आर्ट सिखाए। कला को जीवन का हिस्सा मानने वाली मृणालिनी की सोच ने नई पीढ़ी को प्रेरित किया।
दिल्ली में उनकी पहली कथकली प्रस्तुति में नेहरू उपस्थित थे। ‘मनुष्य’ नाटक ने रंगमंच को नया रूप दिया। लेखन, कविता और सामाजिक कार्यों में भी उनका योगदान सराहनीय। आत्मकथा में उनके जीवन का सार झलकता है।
गुजरात हैंडलूम, नेहरू फाउंडेशन की अध्यक्ष रहीं। गांधीवादी विचारों को फैलाया, रूढ़ियों के खिलाफ लड़ीं। बेटी मल्लिका विरासत संभाल रही हैं। पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित मृणालिनी का नृत्य आज भी जीवंत है।