
नई दिल्ली। ग्रीनलैंड एक बार फिर सुर्खियों में है, और इसके पीछे हैं अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान। पिछले एक महीने से वे लगातार इस विशाल हिमखंडी द्वीप को अमेरिका का हिस्सा बनाने की बात कर रहे हैं। अगर यह हासिल हो गया, तो अमेरिका क्षेत्रफल में रूस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बन जाएगा, कनाडा को पछाड़ते हुए।
रणनीतिक महत्व ग्रीनलैंड को सोने का खदान बनाता है। आर्कटिक क्षेत्र में इसकी स्थिति, दुर्लभ धातुओं के भंडार और बर्फ पिघलने से खुलने वाले समुद्री रास्ते इसे अमेरिका, रूस व चीन के लिए लालच का केंद्र बनाते हैं। अमेरिका यहां थूले एयरबेस जैसी सैन्य सुविधाएं पहले से चला रहा है, लेकिन पूर्ण अधिग्रहण नया अध्याय होगा।
यह ख्याल अमेरिकी इतिहास से प्रेरित है। 1867 में अलास्का की सस्ती खरीद ने देश का आकार दोगुना किया। जेम्स पोल्क ने मेक्सिको युद्ध से टेक्सास-कैलिफोर्निया हथियाए, ‘मैनिफेस्ट डेस्टिनी’ के नाम पर। मैककिन्ले ने 1898 में स्पेन पर जीत से फिलीपींस आदि जोड़े। ट्रंप मैककिन्ले के प्रशंसक हैं।
लेकिन आज का दौर अलग है। डेनमार्क व ग्रीनलैंड सरकारें साफ कह चुकीं- ‘ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं।’ स्थानीय सहमति, अंतरराष्ट्रीय कानून बाधा हैं। ट्रंप की यह बहस अमेरिकी विस्तारवाद को फिर जिंदा करती है, आर्कटिक प्रतिस्पर्धा के बीच। क्या इतिहास दोहराएगा?