
बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद उत्पन्न राजनीतिक शून्य ने एक नई चुनौती को जन्म दिया है। ‘तौहीदी जनता’ नामक इस्लामी आंदोलन का तेजी से उभरना सुरक्षा विशेषज्ञों और विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। यह आंदोलन पारंपरिक उग्रवाद की बजाय नैतिक दबाव की राजनीति के रूप में काम कर रहा है, जो कमजोर संस्थाओं और ढीली कानून-व्यवस्था में पनप रहा है।
पिछले 16 वर्षों में अवामी लीग सरकार ने चुनावी धांधली, मजबूत खुफिया तंत्र और बंगाली धर्मनिरपेक्षता के बल पर इस्लामी ताकतों को काबू में रखा। धार्मिक दलों को कुचला गया, कुछ को सत्ता में भागीदार बनाया गया। राजनीतिक इस्लाम को सख्ती से नियंत्रित किया गया, जिससे यह अनौपचारिक क्षेत्रों में सिमट गया।
हसीना के पतन के साथ यह संतुलन बिगड़ गया। तौहीदी जनता ने सार्वजनिक जीवन पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। यह कोई केंद्रीकृत संगठन नहीं, बल्कि एक बैनर है जिसके नीचे विभिन्न समूह एकजुट हो रहे हैं। वे सड़कों पर नैतिक पहरा डालते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रोकते हैं, महिलाओं के आयोजनों पर हमला बोलते हैं।
इसकी ताकत इसकी अस्पष्टता में है—बिना नेतृत्व के यह भीड़ और प्रतीकों से काम करता है। देशभर में हिंसक घटनाएं भी दर्ज की गई हैं। यह आंदोलन ‘गैर-इस्लामी’ मूल्यों को धार्मिक कर्तव्य के नाम पर निशाना बनाता है, जिससे दमन मुश्किल हो जाता है।
बांग्लादेश को अब संस्थागत मजबूती और राजनीतिक स्थिरता की जरूरत है। अन्यथा यह लामबंदी समाज को नए सिरे से ढाल देगी, जो देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा के लिए खतरा साबित हो सकती है।
