
विज्ञान के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो संकल्प की मिसाल बन जाते हैं। नोबेल विजेता हरगोविंद खुराना का जीवन इसी सत्य को प्रमाणित करता है कि साधन नहीं, दृढ़ इच्छाशक्ति इतिहास रचती है। 1922 में पंजाब के रायपुर गांव में जन्मे खुराना ने गरीबी के बावजूद वैश्विक ऊंचाइयों को छुआ।
उनके पिता पटवारी थे, जिनके 14 बच्चों को पढ़ाने में आर्थिक तंगी बाधा बनी। फिर भी, खुराना ने मिट्टी के घरों में दीपक की रोशनी में पढ़ाई की। पंजाब यूनिवर्सिटी से टॉप करके लिवरपूल और कैम्ब्रिज पहुंचे।
1968 में नोबेल पुरस्कार उनकी जेनेटिक कोड खोज के लिए मिला। उन्होंने पहला कृत्रिम जीन बनाया, जो जीव विज्ञान में क्रांति लाया। एमआईटी में उन्होंने जैवप्रौद्योगिकी को नई दिशा दी।
भारत लौटकर उन्होंने विज्ञान के महत्व पर जोर दिया। 2011 में उनका निधन हुआ, लेकिन योगदान अमर हैं। आज जब संसाधन प्रचुर हैं, खुराना याद दिलाते हैं कि संकल्प ही असली शक्ति है। उनकी प्रेरणा से नई पीढ़ी प्रेरित हो रही है।
