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चंदे के ₹16 हजार.. 13 छात्र.. इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैसे बना पूरब का ऑक्सफोर्ड, जानिए 135 साल की गजब कहानी

चंदे के ₹16 हजार.. 13 छात्र.. इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैसे बना पूरब का ऑक्सफोर्ड, जानिए 135 साल की गजब कहानी

प्रयागराज: पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहबाद विश्वविद्यालय स्थापना के 135 साल पूरे कर लिए हैं। 23 सितम्बर 1887 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शुरुआत मात्र 16 हजार के चंदे की राशि,13 छात्रों के साथ किराये के भवन ‘दरभंगा कैसल’ से हुई। Quat Rami Tot Arbores यानी जितनी अधिक शाखायें उतना अधिक वृक्ष के सिद्धान्त को लेकर आज इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के विशालकाय वटवृक्ष के रूप में स्थापित हो चुका है। एक सौ पैंतीस वर्ष के सफर में करीब 35 हजार छात्रों 400 शिक्षकों की संख्या पहुंच चुकी है।

भारत के सबसे प्राचीनतम तथा प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में यह चौथा विश्वविद्यालय है। इसे ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ घोषित किया गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय अधिनियम, 2005 जो 14 जुलाई, 2005 से प्रभावी हुआ है। इसके अंतर्गत इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।

संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर विलियम म्योर की पूरब में ऑक्सफोर्ड बनाने की इच्छा थी। उस समय उत्तर भारत में शिक्षा का कोई बड़ा केंद्र नहीं था। यहाँ की शिक्षा संस्थाओं की संबद्धता कलकत्ता विश्वविद्यालय से थी।

24 मई 1867 को इलाहाबाद में विलियम म्योर ने एक स्वतंत्र महाविद्यालय तथा एक विश्वविद्यालय की स्थापना पर योजना शुरू की।और 1867 में इस कार्य के लिए एक कमेटी बनायी गई। जिसमें प्यारे मोहन बनर्जी अवैतनिक सचिव बनाये गये।

प्रारम्भ में महाविद्यालय की स्थापना के लिए 16 हज़ार रुपए एकत्र करने का संकल्प लिया गया। योजना को मूर्तरूप देने के लिए लाला गयाप्रसाद, बाबू प्यारे मोहन बनर्जी, मौलवी फरीदुद्दीन, मौलवी हैदर हुसैन, राय रामेश्वर चौधरी ने एक आंदोलन चला दिया। 1869 में निर्माण के लिए स्थान का चयन किया गया।

इसके बाद दूसरी कमेटी बनी जो महाविद्यालय का भवन बनवाने के प्रस्ताव पर कार्य कर और योजना आगे बढ़ सके। प्रस्तावित महाविद्यालय का भवन निर्मित होने तक दूसरे भवन को किराए पर लेने का प्रस्ताव रखा गया। जिसे लेफ्टीनेंट गवर्नर सर विलियम म्योर ने स्वीकार कर लिया। और कमेटी ने ‘दरभंगा कैसेल’ भवन मात्र ढ़ाई सौ रुपए महीने के किराए पर तीन वर्ष के लिए ले लिया।

22 जनवरी 1872 को स्थानीय सरकार ने इलाहाबाद में महाविद्यालय खोलेने के ज्ञापन को भारत सरकार के पास स्वीकृति के लिए भेजा और स्वीकृति मिलने पर सर विलियम म्योर के पास एक पत्र भेजा गया कि महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर क्यों न रख दिया जाए। लेफ्टीनेंट गवर्नर सर विलियम म्योर ने स्वीकृति दे दी। जुलाई 1872 से ‘म्योर सेंट्रल कॉलेज’ ने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया।

हिज एक्सेलेंसी जार्ज बैरिंग वायसराय तथा भारत के गवर्नर जनरल ने ‘म्योर कॉलेज’ की आधारशिला 9 दिसंबर 1873 को रखी। ‘म्योर सेंट्रल कॉलेज’ का डिज़ाइन डब्ल्यू एमर्सन ने बनाया था। कॉलेज का भवन पूरा होने में बारह वर्ष लग गये। इस भवन का औपचारिक उद्घाटन 8 अप्रैल 1886 को वायसराय लार्ड डफरिन ने किया। विश्वविद्यालय के भवन की भव्य शैली तथा स्थापत्य प्राचीन और पाश्चात्य विचारों, परंपराओं के मिलन के आधार पर यह पूर्व का ऑक्सफोर्ड माना जाने लगा।

23 सितंबर 1887 को एक्ट XV-11 पास हुआ और विधिवत इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी अब कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास विश्वविद्यालयों की ही भाँति उपाधि प्रदान करने वाली संस्था बन गया था। इस विश्वविद्यालय की प्रथम प्रवेश परीक्षा मार्च 1889 में हुई। जिसमें रीवा सतना जबलपुर के पास अजमेर पटियाला हाउस जोधपुर तक के छात्रों ने हिस्सा लिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने देश को दिए प्रेजिडेंट,पीएम व सीएम
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से साल 1949 में विश्वनाथ प्रताप सिंह छात्रसंघ का चुनाव जीते। बाद में वह देश के 8वें प्रधानमंत्री बने। देश के 9वें प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही छात्र राजनीति में सक्रिय हुए। इसके अलावा इसी यूनिवर्सिटी के छात्र गुलजारीलाल नंदा ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई। नेपाल के प्रधानमंत्री रहे सूर्य बहादुर थापा भी यहां से पढ़ चुके हैं।

राजनीति का रहा पावर हब

◆वीपी सिंह (8वें प्रधानमंत्री)
◆चंद्रशेखर (9वें प्रधानमंत्री)
◆शंकरदयाल शर्मा (पूर्व राष्ट्रपति)
◆गोपाल स्वरूप पाठक (पूर्व उपराष्ट्रपति)
◆सूर्य बहादुर थापा (पूर्व प्रधानमंत्री, नेपाल)
◆गुलजारी लाल नंदा (पूर्व कार्यवाहक पीएम)
◆राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन (पूर्व सांसद व स्वतंत्रतासेनानी)
◆पंडित गोविंद वल्लभ पंत (पूर्व सीएम, यूपी व पूर्व केन्द्रीय मंत्री )
◆राजेन्द्र कुमारी बाजपेई (पूर्व उपराज्यपाल पांडिचेरी)
◆नारायण दत्त तिवारी (पूर्व सीएम, यूपी)
◆अर्जुन सिंह (पूर्व सीएम, एमपी)
◆सत्येन्द्र नारायण सिन्हा (पूर्व सीएम, बिहार)
◆हेमवती नंदन बहुगुणा (पूर्व सीएम, यूपी)
◆रज्जू भैया (पूर्व प्रमुख आरएसएस)
◆मुरली मनोहर जोशी (पूर्व केन्द्रीय मंत्री)
◆जनेश्वर मिश्र (पूर्व केन्द्रीय मंत्री)
◆रीता बहुगुणा जोशी (पूर्व कैबिनेट मंत्री,सांसद,यूपी)
◆मदन मोहन मालवीय (आईएनसी के पूर्व अध्यक्ष)
◆मदन लाल खुराना (पूर्व सीएम, दिल्ली)

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभिन्न प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में यहां के छात्र मुख्य न्यायाधीश बने। न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र, गोपाल स्वरूप पाठक, जेएस वर्मा, आरएस पाठक, वीएन खरे, मिलन मुखर्जी, श्यामनाथ कक्कड़ यहीं के छात्र रहे हैं।गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ भी यहीं पढ़े थे। इलाहाबाद के कई छात्र विभिन्न प्रदेशों के राज्यपाल, और दूतावासों के राजदूत बने।

AU साहित्यकारों का विश्वविद्यालय रहा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने अंग्रेजी साहित्य, पर्शियन और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। महान साहित्यिक विभूतियों में महादेवी वर्मा, भगवती चरण वर्मा, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी और विद्या निवास मिश्र ने भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की। इन सभी लोगों को पद्म विभूषण मिला हुआ है। मशहूर साहित्यकार धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, दूधनाथ सिंह, हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रा नंदन पंत ने यहां से पढ़ाई-लिखाई की। यहां से पढ़े साहित्यकारों की सूची काफी लंबी है।
इनपुट-शिवपूजन सिंह

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