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  Editorial:भारत के लोकतंत्र में क्रांति बनेगा वन नेशन वन इलेक्शन

1-8-2022

जब तक देश एक रीत में नहीं चलेगा तब तक व्यवधान उत्पन्न होते रहेंगे। एक देश, एक विधान, एक निशान के बाद अब एक चुनाव पर सरकार का ध्यान केंद्रित हो चला है। ये खबरें तो पहले भी बाहर आती रही हैं कि सरकार पूरे देश में एक बार में ही चुनाव कराने की नीति पर काम कर रही है। अब इसके क्रियान्वयन पर काम चालू हो गया है जिसके बाद भारत में चुनावी सीजऩ वाला कॉन्सेप्ट ख़त्म हो जाएगा जिसके कारण भारत आए दिन देश में सिफऱ् चुनाव देखता रहता है।

सभी चुनाव एक साथ कराने का हो रहा प्रयास

दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा समूचे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की क़वायद तेज कर दी है। सरकार ने इस संदर्भ में अध्ययन करने हेतु मामला विधि आयोग को हस्तांतरित किया है ताकि ज़मीनी रूप से उसके अनुपालन और रूपरेखा को तय किया जा सके। ज्ञात हो कि आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में होने हैं जिसके साथ 6 राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने तय हैं।

जिस प्रकार पीएम मोदी सदा से ही इस संदर्भ में अपनी बात मुखरता से रखते आए हैं कि देश के भीतर किसी भी छोर पर किसी को कम तो किसी को ज़्यादा न तो मिलना चाहिए न ही मिलने दिया जाएगा। सभी वर्गों को समान रूप से हर नीति नियामक के दायरे में लाया जाएगा। कुछ ऐसा ही सरकार चुनावों को लेकर करना चाहती है जिस पर एक लंबे समय से काम चल रहा है। वर्ष 2018 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ऐसा माहौल है कि देश में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने की जरूरत है।

आयोग ने उस समय सुझाव दिए थे कि संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के कार्यकाल), अनुच्छेद 172 (विधानसभा के कार्यकाल) तथा जनप्रतिनिधत्व कानून, 1951 में संशोधन करने के बाद चुनाव एक साथ करवाए जा सकते हैं। इससे देश के लगातार चुनाव मोड में रहने से निजात पायी जा सकती है।

वहीं, इससे पूर्व 2016 में संसदीय समिति भी अपनी अंतरिम रिपोर्ट दे चुकी है। सरकार ने इस रिपोर्ट को भी आयोग को दिया है जिसे एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट में संसदीय समिति ने भी एक साथ चुनाव कराने की आवश्यकता बतायी थी लेकिन कहा था कि सभी राजनीतिक दलों और क्षेत्रों की एक साथ चुनाव पर सहमति बनाने में एक दशक का समय लग सकता है। ऐसे में समय तो लगेगा पर जो खर्च वर्तमान में सरकार हर चुनाव पर वहन कर रही है उससे आगामी समय में देश में एक साथ चुनाव होने पर निजात मिलेगी।

केंद्र सरकार ने चुनाव को लेकर वर्ष 2014 से 2020 तक 5794 करोड़ रुपये जारी किए थे। छह वर्ष के इस अंतराल में 50 विधानसभा चुनाव और दो बार लोकसभा के चुनाव हुए हैं। नियम के अनुसार, लोकसभा चुनावों में पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है जबकि विधानसभा चुनावों का खर्च संबंधित राज्य उठाता है। ऐसे में यदि सभी चुनाव एक बार में होते हैं तो यह ख़र्चा आधा हो जाएगा।

रही बात चुनाव आयोग की, तो वह पहले ही कह चुका है कि उसे एक साथ चुनाव कराने में कोई दिक्कत नहीं है। इसके लिए उसे बस वोटिंग मशीनों की संख्या बढ़ानी होगी जिसे वह एक तय समय में कर सकता है।

ऐसे में वो समय आना तय है जब देश में एक साथ चुनाव होंगे। पूर्व में ऐसा नहीं है कि भारत में कभी एक साथ चुनाव नहीं हुए हैं। देश में विधानसभा और लेाकसभा के चुनाव 1951 से लेकर 1967 तक एक साथ ही हुए थे। लेकिन उसके बाद सभी चुनाव अलग-अलग संपन्न होने लगे जिसको पुन: पहले की तरह करने का बीड़ा सरकार ने उठाया है। अब वन नेशन वन इलेक्शन हकीकत बनने से कुछ ही कदम दूर हैं और सभी इसके साक्षी बनने जा रहे हैं।

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