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दरगाह का पानी, ताबीज, वशीकरण और धर्मांतरण: लव जिहाद का जाल, कैसे बनाते हैं शिकार

लव जिहाद या ग्रूमिंग जिहाद की शिकार दो तरह की लड़कियाँ होती हैं। एक गरीब दलित हिंदू या निम्न आय वर्ग की उच्च जाति की हिंदू लड़कियाँ और दूसरी महाराष्ट्र की ब्राह्मण लड़कियाँ या फिर उच्च जाति के संपन्न परिवार की लड़कियाँ। ये खुलासा सूरत की सामाजिक कार्यकर्ता कविता दुबे ने किया जो लंबे समय से इस विषय पर काम कर रही हैं। वह उत्तरप्रदेश के जौनपुर की रहने वाली हैं और अब सूरत को अपना घर कहती हैं। ग्रूमिंग जिहाद मामले में हमने पहले आपको सूरत के औद्योगिक इलाके सचिन की रहने वाली पूजा की कहानी बताई थी

एक कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर हमें बताया, “सोनी समुदाय की एक लड़की जो एमएससी में गोल्ड मेडलिस्ट थी, आगे की पढ़ाई नहीं कर पाई क्योंकि वह एक मुस्लिम लड़के के प्रेम में पड़ गई थी जो पास के होटल में वेटर था। उस समय वह बस यही जानती थी कि उसका नाम समीर है। उसे ये नहीं मालूम था कि वो लड़का हिंदू नहीं है। वो उसके साथ मुंबई भागी और वहाँ शादी की। मगर दो साल बाद उसने वापस आने का मन बना लिया। बाद में पुलिस, सरकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उसे वापस लेकर आई।”

कार्यकर्ता ने कहा कि शहर के बाहर स्थित कई मस्जिदों और दरगाह में मौलवी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सूरत के नजदीक लिंबायत में एक दरगाह है। जहाँ अच्छे दिखने वाले लड़कों को ट्रेनिंग दी जाती हैं कि लड़कियों से कैसे फ्लर्ट करें और उन्हें कैसे फँसाएँ। ट्रेनिंग अन्य गैर सामाजिक कार्यों की भी होती हैं। लड़कों की अमीर लाइफस्टाइल दिखाने के लिए फंड दिया जाता है। कार्यकर्ता बताते हैं कि शहरों के बाहरी हिस्से में स्थित दरगाह और मदरसे ऐसी गतिविधियों के केंद्र हैं।

भरूच में कुछ नर्सिंग कॉलेज और अस्पताल हैं जो कुछ ट्रस्ट द्वारा चलाए जाते हैं ताकि आदिवासी महिलाओं को इस्लाम में परिवर्तित किया जा सके। ऑपइंडिया से बात करते हुए भरूच की कार्यकर्ता ने बताया कि कई आदिवासी महिलाएँ हैं जिन्हें नर्स बनने की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें वहीं नौकरी दे दी गई जिसके ट्रस्टी मुसलमान हैं। यहाँ ज्यादातर डॉक्टर अहल-अल-हदीस से जुड़े हैं जिसके अनुयायी ‘परंपरावादी’ के रूप में जाने जाते हैं और कुरान व प्रमाणिक हदीस को ही कानून मानते हैं।

हंसोट में एक दरगाह है जहाँ 95 फीसद लोग जो जाते हैं वो हिंदू हैं । 20 साल से इन मुद्दों पर काम करने वाले कार्यकर्ता ने बताया, “उनके (हिंदुओं के) लिए यही आस्था का ठिकाना है। हिंदुओं ने इन मौलवी को अपना गुरु मानना शुरू कर दिया है। जबकि जब इन दरगाहों पर जाने वाले हिंदू खुद को हिंदू मानते हैं, वहीं उनकी आस्था कमजोर होती है। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि वे जबरन धर्म परिवर्तन के शिकार हैं, उसका कारण वास्तव में आस्था का कमजोर पड़ना है।”

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