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UP Election 2022: यूपी चुनाव से पहले सबसे ज्यादा टूट झेल रही बसपा, 19 में से बचे हैं मात्र 5 विधायक, जानिए हाल-फिलहाल में कितने माननीयों ने छोड़ी पार्टी

UP Election 2022:  यूपी चुनाव से पहले सबसे ज्यादा टूट झेल रही बसपा, 19 में से बचे हैं मात्र 5 विधायक, जानिए हाल-फिलहाल में कितने माननीयों ने छोड़ी पार्टी

कभी देश की राजनीत‍ि में मजबूत दखल रखने वाली बहुजन समाज पार्टी 2022 में होने वाले उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सबसे ज्‍यादा टूटने वाली पार्टी बनती जा रही है। जनाधार रखने वाले बड़े नेताओं का पार्टी छोड़कर जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। बसपा विधान मंडल दल के नेता शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली भी अपने सभी पदों से इस्‍तीफ दे चुके हैं। रिकॉर्ड उठाकर देखेंगे तो पिछले सात वर्षों में 150 से ज्‍यादा नेता पार्टी का साथ या तो छोड़ चुके हैं, या निकाले जा चुके हैं, इनमें कई वे चेहरे भी थे जो कभी पार्टी की पहचान हुआ करते थे।

इन सबके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती को लगता है कि उनकी पार्टी 2022 के चुनाव में 2007 जैसा प्रदर्शन करेगी, ये दावा तब है जब उनके पास इस समय अपना दल (एस) और कांग्रेस से भी कम विधायक बचे हुए है।

19 में से अब 5 विधायक ही हैं साथ
वर्ष 2017 में हुए उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 403 में से बसपा ने 19 सीटें जीती थीं। निष्‍कासन और पार्टी छोड़ने की वजह से विधानसभा में बसपा के अब महज 5 विधायक ही बचे हैं, जिनमें से एक मुख्‍तार अंसारी जेल में हैं।

जीते हुए 19 में विधायकों में से असलम राईनी, असलम अली चौधरी, मुज्तबा सिद्दिकी, हाकिल लाल बिंद, हरगोविंद भार्गव, सुषमा पटेल, वंदना सिंह, लालजी वर्मा, रामचल राजभर, रामवीर उपाध्याय, अनिल सिंह, शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली और पार्टी का हिस्‍सा नहीं हैं। जबक‍ि आजमगढ़ के दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे सुखदेव राजभर का इसी साल 18 अक्‍टूबर को लखनऊ में निधन हो गया था। इस तरह उत्‍तर प्रदेश की विधानसभा में बसपा के अब मात्र पांच विधायक बचे हैं। इससे ज्‍यादा तो सांसद (10) है। वहीं उत्‍तर प्रदेश विधान परि‍षद में पार्टी के अभी दो और राज्‍य सभा में भी इतने ही सदस्‍य हैं। छत्‍तीसगढ़ विधानसभा में बसपा को दो सदस्‍य हैं। विधायकों की वर्तमान संख्‍या के लिहाज से देखें तो बसपा से ज्‍यादा विधायक अपना दल (एस) और कांग्रेस के हैं।

कांशीराम के समय के नेताओं को पार्टी से निकाला
इसी साल हुए पंचायत चुनाव के बाद मायावती ने विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर को पार्टी से निकाल दिया। ये दोनों वे नेता थे जा 2017 में भाजपा की लहर में भी अपनी सीट बचाने में सफल रहे थे। लालजी वर्मा अंबेडकरनगर के कटेहरी और राजभर अकबरपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। दोनों नेता बसपा के साथ कांशीराम के जमाने से थे। राजभर 1993 में पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक बने। तब से उनकी जीत का सिलसिला जारी है। वर्मा 1986 में पहली बार एमएलसी बनाए गए। इसके बाद उन्होंने 1991, 1996, 2002, 2007 और 2017 का विधानसभा चुनाव भी जीता।

पिछले 10 महीने में कई दिग्‍गज नेताओं ने छोड़ा साथ
इस जनवरी से अब तक कई दिग्‍गज नेता बसपा छोड़ चुके हैं। इसी साल जुलाई में दो बार विधायक रहे डॉ. धर्मपाल सिंह वापस सपा में चले गए। एक समय बसपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार कुंवरचंद वकील भी सपा में शामिल हो गए। इसी तरह जनवरी में बसपा नेता सुनीता वर्मा, पूर्व मंत्री योगेश वर्मा सहित कई नेता बसपा छोड़ समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।

मुख्‍तार के भाई और अंबिका साइकिल पर सवार
अगस्‍त 2021 में बसपा विधायक मुख्‍तार अंसारी के बड़े भाई सिब्कातुल्लाह अंसारी अपने समर्थकों के साथ सपा में शामिल हो गए। सिब्कातुल्लाह अंसारी मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र से 2007 में सपा और 2012 में कौमी एकता दल से विधायक रहे। 2017 में बसपा से मैदान में उतरे थे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनके साथ बसपा नेता अंबिका चौधरी ने भी घर वापसी करते हुए साइकिल पर सवार हो गए।

चौधरी 1993 से 2007 तक बलिया के फेफना सीट पर जीत दर्ज करते आए हैं। साल 2012 में भाजपा प्रत्याशी से हार गए थे। जबकि 2017 में उन्होंने सपा से टिकट नहीं मिलने पर नाराज होकर बसपा का दामन थाम लिया था। लेकिन उन्हें भाजपा प्रत्याशी से फिर हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने बसपा से इस्तीफा दे दिया था। पंचायत चुनाव के दौरान उनके बेटे आनंद चौधरी ने सपा की सदस्यता ली थी।

गठबंधन में भी बसपा पीछे
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बसपा एक नहीं, कई समस्‍याओं से जूझ रही है। 2022 के चुनाव को देखते हुए बड़ी पार्टियां छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर रही हैं, इसमें समाजवादी पार्टी सबसे आगे है। सपा इस चुनाव में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के बाद जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ गठबंधन करने के नजदीक है जबक‍ि आम आदमी पार्टी और अपना दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बातचीत शुरू हो गई है। इतना ही नहीं सूबे के तमाम छोटे दलों को भी अखिलेश यादव अपने साथ मिलाने की मुहिम में जुटे हैं। इस रेस में मायावती की पार्टी बसपा कहीं नहीं है। ये वही सपा है जिसके साथ मिलकर बसपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। तब बसपा, सपा से ज्‍यादा फायदे में थी। उत्‍तर प्रदेश में भाजपा को 63 सीटें मिली थी, जबक‍ि बसपा को 10 और समाजवादी पार्टी को 5 सीटें मिलीं थी।

मायावती को 2007 जैसे करिश्‍मे की उम्‍मीद
मायावती पहले ही कह चुकी हैं उनकी पार्टी 2022 का चुनाव अकेले लड़ेगी। उनका यह भी दावा है कि उनकी पार्टी 2022 में 2007 का प्रदर्शन दुहराएगी। शायदी यही वजह है क‍ि बसपा का फोकस एक बार फिर ब्राह्मण वोटरों पर ज्‍यादा है। प्रदेशभर में हुए ब्राह्मण सम्‍मेलन इसी की ओर इशारा कर रहे हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 403 में से 86 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे और 41 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी। तब बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।

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गौर करने वाली एक बात यह भी है क‍ि 2007 में हुए चुनाव से एक साल पहले भी बसपा ने अपने उम्‍मीदवार घोषित की दिए थे, लेकिन इस बार की स्थित‍ि पशोपेश में है।

लेकिन 2007 के बड़े चेहरे अब साथ नहीं
भले ही मायावती को 2022 में 2007 जैसे करिश्‍मे की उम्‍मीद है, लेक‍िन जिन चेहरों के दम पर बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, उनमें से ज्‍यादातर अब पार्टी के साथ नहीं हैं। नकुल दुबे, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, रामवीर उपाध्याय, ठाकुर जयवीर सिंह, सुधीर गोयल, स्वामी प्रसाद मौर्य, वेदराम भाटी, चौधरी लक्ष्मी नारायण, राकेश धर त्रिपाठी, बाबू सिंह कुशवाहा, फागू चौहान, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद चौधरी, धर्म सिंह सैनी, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर और इंद्रजीत सरोज जैसे नेताओं ने उस जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी।

इनमें से 15 नेता दूसरी पार्टियों का हाथ थाम चुके हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब कांग्रेस में हैं। ठाकुर जयवीर सिंह, वेदराम भाटी, स्वामी प्रसाद मौर्य, चौधरी लक्ष्मी नारायण, फागू चौहान और धर्म सिंह सैनी भारतीय जनता पार्टी में चले गये। बाबू सिंह कुशवाहा भी पहले भाजपा गये थे लेकिन अब वे उन्‍होंने जन अधिकार पार्टी के नाम से नई पार्टी बना ली है। इंद्रजीत सरोज और राम प्रसाद सैनी जैसे नेता अब सपा में हैं। बृजेश पाठक भी कभी बसपा के कद्दावर नेता जो अब भाजपा की सरकार में मंत्री हैं।

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