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अब भारत में मुफ्तखोरी और कर्जमाफी की बैसाखियों पर नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास पर लड़े जाएंगे चुनाव

23-feb-2021

इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए दो राज्यों– असम और बंगाल के दौरे पर हैं। दोनों ही राज्यों में उन्होंने कई अहम इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखते हुए कहा, “जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक आप पर राज करते थे, उन्हें लगता था कि दिसपुर दिल्ली से बहुत दूर है। दिल्ली अब दूर नहीं आपके दरवाजे पर है”

इस एक बयान से पीएम मोदी ने अपनी सोच को एक बार फिर से स्पष्ट किया। अब वो दिन लद गए जब लोकलुभावन नीतियों और कर्जमाफी के बल पर चुनाव जीते जाते थे। अब इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करना, देश की सुरक्षा इत्यादि भी महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे हो सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में अभी नरेंद्र मोदी ने चुनाव के लिए तैयार दो अन्य राज्यों – केरल और तमिलनाडु में कई इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का शुभारंभ करते हुए कहा, “प्रख्यात मलयाली कवि कुमारन आसन ने कहा, ‘मुझे आपकी जाति नहीं जाननी बहन, मैं प्यास हूँ, मुझे पानी चाहिए’। विकास और सुशासन को जात, पात, धर्म, लिंग इत्यादि से कोई वास्ता नहीं। विकास सबके लिए समान है”

लेकिन इसका चुनाव से क्या वास्ता? वास्ता है, क्योंकि वर्तमान बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट तौर पर चुनाव के लिए तैयार राज्यों के लिए विशेष प्रावधान किया है, जैसे –

03 लाख करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहा 3500 किलोमीटर लंबा राष्ट्रीय हाइवे, जिनमें Madurai-Kollam कॉरिडोर एवं Chittoor-Thatchur कॉरिडोर भी शामिल है।

1,100 km लंबा नेशनल हाइवे का एक सेगमेंट, जो केरल में निर्मित होगा, और 65000 करोड़ का निवेश भी इसमें किया जाएगा।

पश्चिम बंगाल में 675 km लंबा हाइवे, जो कोलकाता सिलीगुड़ी स्ट्रेच के अपग्रेडेशन का हिस्सा होगा, और जिसमें 25000 करोड़ का निवेश होगा।

असम में प्रस्तावित 19000 करोड़ रुपये की लागत से नेशनल हाइवे का निर्माण, जिसमें 34000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान भी शामिल है।

तो इससे मोदी सरकार की नीतियों के बारे में क्या पता चलता है? दरअसल, मोदी सरकार बुनियादी सुविधाओं को भी चुनाव में एक अहम मुद्दा बनाना चाहती है, जो किसी भी लोकतान्त्रिक चुनाव में सबसे अहम बात है। दशकों तक मुफ्तखोरी और कर्जमाफ़ी को ढ़ाल बनाकर चुनाव लड़े गए हैं और जीते भी गए हैं। लेकिन ये आगे चलकर कितना हानिकारक सिद्ध हुआ है, ये आप दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के उदाहरण से स्पष्ट समझ सकते हैं।

लेकिन PM मोदी ऐसे लोकलुभावन नीतियों में विश्वास नहीं रखते। वे बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना चाहते हैं, ताकि रोजगार की कोई कमी न हो, और लोगों को बेरोजगारी भत्ता, मुफ़्त का राशन, सब्सिडी इत्यादि जैसी बैसाखियों पर लोगों को निर्भर न रहना पड़े।

यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण इस देश में एक अहम मुद्दा बनता है, तो इससे न सिर्फ अन्य पार्टियों को प्रतिस्पर्धा में काम करने को विवश होना पड़ेगा, बल्कि उन्हें बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने पर ध्यान भी देना पड़ेगा। इससे एक इन्फ्रास्ट्रक्चर आधारित अर्थव्यवस्था का न केवल सृजन होगा, बल्कि मुफ्तखोरी का भी अंत होगा, जिसके कारण हमारा देश दशकों तक पीछे रहा था।