भोपाल केन्द्रीय जेल की चार महिला कैदियों सहित 42 कैदियों को पैरामेडिकल कोर्स कराया जा रहा है, ताकि जेल से रिहा होने के बाद उन्हें रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़े और वे अपने परिवार की परवरिश सही तरह से कर सकें. जेल प्रशासन का दावा है कि भोपाल की केन्द्रीय जेल संभवत: देश की पहली ऐसी जेल है, जहां जेल के बंदी पैरामेडिकल का कोर्स कर रहे हैं. ये कैदी एक जून से यह कोर्स कर रहे हैं तथा तीन महीने का यह कोर्स है.
भोपाल केंद्रीय जेल के अधीक्षक दिनेश नरगावे ने बताया, ‘केन्द्रीय जेल भोपाल में 42 बंदियों को तीन महीने का पैरामेडि​कल कोर्स कराया जा रहा है. इस कोर्स को चार महिला कैदी एवं 38 पुरूष कैदी कर रहे हैं. इनको ड्रेसिंग एवं इंट्रावीनस थेरेपी (इंजेक्शन एवं ड्रिप चढ़ाना) का कोर्स कराया जा रहा है.’
उन्होंने कहा, ‘पिछले एक महीने से ये कैदी यह कोर्स कर रहे हैं. यह कोर्स नि:शुल्क कराया जा रहा है. वर्तमान में ये कैदी ड्रेसिंग एवं इंजेक्शन लगाना सीख रहे हैं, कुछ दिनों बाद मरीजों को ड्रिप चढ़ाना सीखेंगे.’ नरगावे ने बताया, ‘यह कोर्स करने वाले अधिकतर कैदी हत्या के दोषी हैं और उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली है.’
उन्होंने कहा कि इस कोर्स में उन कैदियों को शामिल किया जा रहा है, जो कम से कम पांच साल की सजा काट चुके हों, उनका आचरण अच्छा रहा हो और जो आदतन अपराधी न हों. इसके साथ-साथ कोर्स करने वाले कैदी को कम से कम 10वीं पास होना अनिवार्य है.
नरगावे ने बताया, ‘इस कोर्स को करने वाला कोई भी कैदी प्रोफेशनल हत्यारा नहीं हैं और इनमें से अधिकतर 10 से 11 साल सजा काट चुके हैं.’ उन्होंने जेल के कैदियों को पैरामेडिकल कोर्स कराने के कदम को अपनी तरह का पहला प्रयास करार देते हुए कहा, ‘देश में कहीं भी जेल में कैदियों को पैरामेडिकल कोर्स कराने का मामला मेरे संज्ञान में नहीं है.’
नरगावे ने कहा कि इस कोर्स को कराने के लिए हमने भोपाल की पीपल्स यूनिवर्सिटी के साथ समझौता किया है और उसने हमें एफिलिएशन दी है. उन्होंने कहा कि कोर्स कर रहे इन कैदियों की सप्ताह में दो दिन क्लास जेल में ही लगती है और बाकी दिन प्रैक्टिस जेल के अंदर बने अस्पताल में डॉक्टर प्रमेन्द्र शर्मा की निगरानी में होती है.
नरगावे ने बताया कि इसके लिए हमने जेल में डिजिटल बोर्ड भी लगा दिया है. उन्होंने कहा कि इन कैदियों को जेल में अंग्रेजी लिखना, पढ़ना एवं बोलना भी सिखाया जा रहा है, ताकि इस काम को करने में उन्हें परेशानी न आये. इसके लिए सेंट जोसेफ स्कूल की एक सेवानिवृत्त शिक्षिका एवं उनके पति की सेवाएं ली गई हैं.
नरगावे ने बताया कि तीन महीने का कोर्स करने के बाद ये बंदी भोपाल केन्द्रीय जेल में इलाज में डॉक्टरों का सहयोग करेंगे. इस काम में पारंगत होने के बाद उन्हें अपनी सजा पूरी करने के बाद रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और वे अपने परिवार की परवरिश भी अच्छी तरह से कर सकेंगे. उन्होंने क​हा कि यदि हमारी यह पहल सफल हो जाती है तो इसके बारे में एक योजना बनाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार को पत्र लिखेंगे, ताकि प्रदेश की अन्य जेलों में भी इस तरह की पहल चालू की जा सके.

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