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मोदी राज और कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता

भारत में उपनिवेशवाद का सबसे गहरा दाग शायद उसके अंतिम दिनों में 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार की अनुचित नीतियों के कारण लगा जब बंगाल में भारी अकाल पड़ा। पीछे मुड़ कर देखें तो यह अकाल बताता है कि अपनी भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के मामले में भी भारत दूसरों पर कितना निर्भर था। आजादी के ठीक बाद, भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं से बड़ी मात्रा में खाद्यान्न आयात कर करना पड़ता था। लगातार 1948, 1962 और 1965 के युद्धों के दौरान भी भारत को भोजन की भारी कमी का सामना करना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसीलिए “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया।

अब 2022 की बात: भारत का कृषि निर्यात 50 बिलियन अमरीकी डॉलर (वित्त वर्ष 2021-22) के ऐतिहासिक उच्च स्तर को छू गया। भारत ने चावल, गेहूं, चीनी सहित अन्य खाद्यान्न और मांस का अब तक का सबसे अधिक निर्यात हासिल किया। वाणिज्यिक इंटेलिजेंस और सांख्यिकी महानिदेशालय द्वारा जारी अस्थाई आंकड़ों के अनुसार 2021-22 के दौरान 19.92% की वृद्धि के साथ कृषि निर्यात में 50.21 बिलियन डॉलर की ऊंचाई छू ली गई। यह उल्लेखनीय उपलब्धि हाल के वर्षों में खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा की गई कई प्रमुख पहलों के कारण संभव हुआ है।

हालांकि, खाद्यान्न के मामले में भारत के आत्मनिर्भर होने की कहानी करीब पांच दशक पहले शुरू होती है। 1950-51 में, भारत सूखे और अकाल के साथ भोजन की कमी से पीड़ित और खाद्यान्न आयात करने को मजबूर था। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, कृषि पर दबाव बढ़ा रही थी और देश खाद्यान्न उत्पादन और उत्पादकता गति बनाए रखने में असमर्थ था। उस समय भी, कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत योगदान दे रहा था। इससे पता चलता है कि हमारी अर्थव्यवस्था किस प्रकार कृषि पर निर्भर थी।

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