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Editorial:CAA विरोधियों को इसकी उपयोगिता समझना जरूरी

4-8-2022

देश में एक बार फि र से CAA अर्थात नागरिकता संशोधन कानून लागू करने की कवायद शुरू हो गई है। क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि, “कोरोना की एहतियाती खुराक (बूस्टर डोज) का काम पूरा होने के बाद (CAA) के नियम बनाएं जाएंगे।”

 दरअसल, बंगाल के बड़े भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने गृह मंत्री अमित शाह से देश में CAA जल्द लागू कराने के संबंध में मुलाक़ात की थी। जिसमें अमित शाह ने ष्ट्र्र को लेकर यह बड़ी बात कही थी। इस बात की जानकारी शुभेंदु अधिकारी ने अपने ट्विटर पर भी साझा की है जिसके बाद से ही देश की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी है। जहां विपक्षी फिर से एक बार इस मुद्दों को लेकर मुसलमानों के मन में गलत अफ वाह लाने को तैयार बैठा है। जो वो 2019 में भी कर चुका है।

ष्ट्र्र को संसद में 11 दिसंबर, 2019 को पारित किया गया था और 12 दिसंबर को इसे नोटिफाई कर दिया गया था। लेकिन अभी तक नियम नहीं बनाए जाने के कारण यह देश में लागू नहीं हो पाया है। इस कानून का नहीं लागू होने की सबसे बड़ी वजह इसको लेकर पूरे देश में आक्रोश और विरोध प्रदर्शन था। उसके बाद रही-सही कसर कोरोना महामारी ने आकर पूरी कर दी थी।

2019 में जब मोदी सरकार CAA नागरिकता संशोधन कानून ले कर आई थी। तब इसको लेकर दिल्ली के शाहीन बाग़ से लेकर पूरे देश में बड़े-बड़े आंदोलन और प्रदर्शन हुए थे। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा जैसे राज्यों में ष्ट्र्र को लेकर लोगों ने बड़े स्तर पर विरोध किया था। यहां तक कि देश के बड़े शिक्षण संस्थान जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया में भी छात्रों ने जमकर प्रदर्शन किया था। देश भर में उपद्रवियों ने हंगामा मचाया, लाखों-करोड़ों की संपत्ति का नुकसान किया। इन प्रदर्शनों में कइयों की जानें चली गई। पुलिस ने कई जगहों पर धारा 144 भी लगाई थी।

इन सब के पीछे कहीं न कहीं देश के लिबरल गैंग, वामपंथियों और विपक्ष की देश का माहौल बिगाडऩे वाली नौटंकी थी। लिबरल गैंग, वामपंथियों और विपक्ष ने उस समय CAA कानून को लेकर कहा था कि “सरकार सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिमों को ही क्यों नागरिकता दे रहीं हैं। सरकार को इन देशों के मुस्लिम को भी नागरिकता देनी चाहिए। इस कानून को लेकर सरकार का दोहरा मापदंड क्यों हैं।” बस क्या था इन सभी बातों ने ष्ट्र्र कानून के विरोध में आग में घी डालने का काम किया। इन लोगों ने देश के मुसलमान के मन में नागरिकता कानून को लेकर ऐसा उच्च दर्जे का जहर घोला, जिसका परिणाम सीधे तौर पर देश भर में आक्रोशित प्रदर्शन के रूप में देखने को मिला।

इन लोगों ने नागरिकता कानून को लेकर जोरों शोरों से दुष्प्रचार किया कि “ये मोदी सरकार शुरुआत से ही मुसलमानों के खिलाफ है, उन्हें देखना नहीं चाहती और तो अब सरकार उनसे ष्ट्र्र और हृक्रष्ट के बहाने से उनकी नागरिकता भी छीनने जा रहीं है।” लेकिन मोदी सरकार ने इस मुद्दे को फ्रं टफु ट पर खेला और इन सब बातों का हमेशा सामने आके खण्डन किया।

 सरकार ने दो टूक में साफ़ बोला कि “ये ष्ट्र्र कानून नागरिकता देने के लिए है ना कि नागरिकता छीनने के लिए। ्र

देश के मुसलमानों को इससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं हैं। वो लोग बस डरें, जो अवैध रूप से देश में फर्जी दस्तावेज के साथ सालों से रह रहें हैं। उनकों किसी भी कीमत पर देश में नहीं रहने दिया जाएगा, चाहे उनके राजनीतिक आका कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें।” अपने इस बयान से सरकार ने पूरे विपक्षी खेमों, लिबरल और वामपंथी को करारा जवाब दिया था।

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ष्ट्र्र क्या है

‘नागरिकता संशोधन कानून जिसे CAA कहते हैं। यह संसद में पास होने से पहले ‘नागरिकता संशोधन बिलÓ ष्ट्रक्च के नाम से जाना जाता था। फिर 12 दिसम्बर 2019 को राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद यह बिल बन गया। ‘नागरिकता संशोधन कानून अल्पसंख्यकों (गैर-मुस्लिम) जैसे- हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी के लिए भारतीय नागरिकता देने का रास्ता खोलता है। इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताडि़त हुए लोगों को नागरिकता दी जाएगी।

इस कानून में यह भी कहा गया है कि “इन लोगों को भारतीय नागरिकता तभी मिलेगी जब वे 31 दिसंबर, 2014 तक या उससे पहले भारत में प्रवेश कर गए हों। साथ ही इन प्रताडि़त हुए लोगों को यह भी साबित करना होगा कि वो अपने देशों से धार्मिक उत्पीडऩ के कारण भागकर भारत आए हैं । ये लोग उन भाषाओं को बोलते हो, जो भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है। ये नागरिक कानून 1955 की तीसरी सूची की अनिवार्यताओं को पूरा करते हो। तब जाकर ये लोग भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन योग्य होंगे।”

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