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Loksabha Election 2024: SP को सियासी दोस्ती से फायदा कम… मिशन 2024 की तैयारी, क्या एकला चलेंगे अखिलेश?

Loksabha Election 2024: SP को सियासी दोस्ती से फायदा कम... मिशन 2024 की तैयारी, क्या एकला चलेंगे अखिलेश?

मेरठ: उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव (Loksabha Election) की तैयारियों में दल जुटने लगे हैं। अभी चुनाव में वक्त हो, लेकिन जमीनी स्तर पर माहौल बनाने की कोशिश भाजपा की ओर से हो रही है। वहीं, समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) अपनी रणनीति पर विचार करती दिखती है। प्रगतिशील समाजवादी जनता पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से सियासी राहें जुदा करने के बाद समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) अकेला चलो की राह पर कदम बढ़ा सकते हैं। दरअसल, सपा को दूसरे दलों से सियासी दोस्ती ज्यादा रास नहीं आई है। गठबंधन में चुनाव लड़ने से सहयोगी दलों को ही फायदा हुआ है। वेस्ट यूपी में जरूर उनकी दोस्ती राष्ट्रीय लोक दल से बनी रह सकती है, इसकी वजह दोनों दलों के लिए जाट मुस्लिम बहुल क्षेत्र में सियासी समीकरण उनके लिए मुफीद होने की आस है।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सपा का ‘यूपी के लड़के’ वाला प्रयोग फेल रहा था। चुनाव में सपा 311 सीटों पर लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी थी। कमजोर कांग्रेस ने 114 सीटों में से 7 जीती थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, प्रगतिशील समाजवादी जनता पार्टी, अपना दल कमेरावादी, गोंडवाना पार्टी, कांशीराम बहुजन मूल निवास पार्टी से गठबंधन कर इन दलों को 55 सीटें दी खी। इसमें सबसे ज्यादा 33 सीटें वेस्ट यूपी में असरदार माने जाने वाले दल रालोद को दी गई। सुभासपा को 18 और अपना दल कमेरावादी को चार सीटें मिली। यूपी चुनाव 2022 में सपा 47 सीटों से 111 सीट तक तो पहुंची, लेकिन दूसरे दलों से दोस्ती के बाद भी सत्ता से दूर रही।

यूपी चुनाव 2022 में वेस्ट यूपी में अखिलेश और जयंत की जोड़ी किसानों की नाराजगी के बावजूद बीजेपी को उम्मीद के मुताबिक सियासी नुकसान नहीं पहुंचा पाई। राष्ट्रीय लोक दल 33 सीटों में से 8 सीटें ही जीत पाई। सपा से गठबंधन का रालोद को फायदा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में सिर्फ एक सीट छपरौली जीत मिली थी। वहां का विधायक भी बाद में बीजेपी में चला गया था। सपा को खास फायदा नहीं हुआ। 2019 के लोकसभा चुनाव सपा का बसपा के साथ गठबंधन हुआ। दोनों दलों ने बराबर सीटें बांटी। चुनाव का रिजल्ट बसपा के पक्ष में रहा। पार्टी 10 सीटें जीती थी और सपा केवल 5 सीटें जीत पाई। वर्ष 2014 के 5 जीत के आंकड़े को पार नहीं किया जा सका। बीएसपी की जीतने वाली आधी सीट सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा वेस्ट यूपी की थी।

बसपा को झेलना पड़ है नुकसान
सपा से गठबंधन के कारण वर्ष 2019 के दस लोकसभा सदस्य जीतने पर खुश बसपा को वर्ष 2022 में अकेले चुनाव लड़ने के कारण केवल एक विधानसभा सीट पर ही जीत मिल सकी। यह हालात तब है जब यूपी में 22 फीसदी दलित हैं। दलितों को बीएसपी को कोर वोट माना जाता हैं। बीएसपी को 2022 में कुल लगभग 13 फीसदी वोट मिले। यह वोट प्रतिशत 1993 के बाद सबसे कम है। एक सीट जीतने से सियासी हलकों में संदेश गया कि बीएसपी का बेस वोटर भी उससे छिटक गया।

माना जा रहा है कि प्रदेश में कुल 22 फीसदी दलित वोटों में से एक बड़ा हिस्सा बीएसपी के खाते में ही जाता रहा है। कांशीराम ने दलितों के साथ अति-पिछड़ा वर्ग को जोड़ा तब वह सत्ता तक पहुंची। 2007 में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जुड़ने पर बीएसपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। सवर्ण अलग होने से 2012 में सत्ता खोनी पड़ी। उसके बाद से बीएसपी का ग्राफ गिरता चला गया।

2019 में वोट प्रतिशत में बढ़ा जरूर, लेकिन सपा के साथ गठबंधन के कारण उसका कारण माना जा गया। 2017 में बीएसपी 22.24 प्रतिशत वोट पाए थे। उसे 19 सीट मिली थी। 2022 में वोट प्रतिशत सिर्फ 13 प्रतिशत रह गया।

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