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सदियों से काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी के बीच विवाद की दीवार, मंदिर को तुड़वाने से लेकर जीर्णोद्धार तक की जानें पूरी कहानी

काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी परिक्षेत्र।

आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: गीतार्जुन गौतम
Updated Fri, 09 Apr 2021 01:47 AM IST

काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी परिक्षेत्र।
– फोटो : अमर उजाला

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द्वादश ज्योर्तिलिंग में शामिल श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की अपनी अलग महिमा है। दुनिया का इकलौता शिवमंदिर है, जहां भोलेनाथ माता पार्वती के साथ विराजते हैं। प्राचीन काल से विश्वनाथ और ज्ञानवापी के बीच विवाद की दीवार बनी हुई है। इतिहास के पन्नों में मंदिर तुड़वाने से लेकर जीर्णोद्धार के अलग-अलग अभिलेख भी मिलते हैं।श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि 14वीं सदी में शर्की सुल्तानों की फौजों ने पहली बार विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाया था। राजा अकबर के समय 16वीं सदी में दक्षिण के विद्वान नारायण भट्ट और अकबर के वितमंत्री टोडरमल ने दोबारा विधिपूर्वक विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की। 1775 में औरंगजेब के मंदिर तोड़ने के 125 साल बाद इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने दोबारा विश्वनाथ मंदिर बनवाया।रानी अहिल्या बाई ने जब इस मंदिर की पुन: प्राण प्रतिष्ठा की थी। उसके कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने लगभग एक टन सोना मंदिर में दान कर दिया था और उसी से मंदिर के शिखर स्वर्णमंडित हुए थे। इस मंदिर के ऊपर एक सोने का छत्र लगा हुआ है। मान्यता है कि इस छत्र के दर्शन करने के बाद भक्त जो भी कामना करते हैं, वह अवश्य ही पूरी होती है।पूर्व महंत परिवार के पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब दान हारावली में इसका जिक्र किया है कि बादशाह अकबर के बाद टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1558 में करवाया था। 1669 में औरंगजेब ने  आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। 18 वीं सदी के दौरान काशी को अपने नियंत्रण में लेने के इच्छुक महादजी सिंधिया जैसे मराठों ने बहुत कोशिश की। उनका प्रयास था कि यह विवाद समाप्त कर लिया जाए। मगर, अंग्रेजों ने कोई पहल नहीं की।अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्या ने बताया कि अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे हैं। धर्मग्रंथों में महाभारत काल से भी पहले का वर्णन मिलता है। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक 1325 ई. के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब विविध कल्प तीर्थ में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी काशी के इतिहास को समेटा है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक तीर्थ चिंतामणि में मंदिर को लेकर वर्णन किया है।बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्ष में फैसला देते हुए कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर का रडार तकनीक से पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मंजूरी दे दी है। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी की अदालत ने बृहस्पतिवार को लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी के आवेदन को स्वीकार कर लिया।

द्वादश ज्योर्तिलिंग में शामिल श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की अपनी अलग महिमा है। दुनिया का इकलौता शिवमंदिर है, जहां भोलेनाथ माता पार्वती के साथ विराजते हैं। प्राचीन काल से विश्वनाथ और ज्ञानवापी के बीच विवाद की दीवार बनी हुई है। इतिहास के पन्नों में मंदिर तुड़वाने से लेकर जीर्णोद्धार के अलग-अलग अभिलेख भी मिलते हैं।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि 14वीं सदी में शर्की सुल्तानों की फौजों ने पहली बार विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाया था। राजा अकबर के समय 16वीं सदी में दक्षिण के विद्वान नारायण भट्ट और अकबर के वितमंत्री टोडरमल ने दोबारा विधिपूर्वक विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की। 1775 में औरंगजेब के मंदिर तोड़ने के 125 साल बाद इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने दोबारा विश्वनाथ मंदिर बनवाया।

रानी अहिल्या बाई ने जब इस मंदिर की पुन: प्राण प्रतिष्ठा की थी। उसके कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने लगभग एक टन सोना मंदिर में दान कर दिया था और उसी से मंदिर के शिखर स्वर्णमंडित हुए थे। इस मंदिर के ऊपर एक सोने का छत्र लगा हुआ है। मान्यता है कि इस छत्र के दर्शन करने के बाद भक्त जो भी कामना करते हैं, वह अवश्य ही पूरी होती है।
पूर्व महंत परिवार के पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब दान हारावली में इसका जिक्र किया है कि बादशाह अकबर के बाद टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1558 में करवाया था। 1669 में औरंगजेब ने  आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। 18 वीं सदी के दौरान काशी को अपने नियंत्रण में लेने के इच्छुक महादजी सिंधिया जैसे मराठों ने बहुत कोशिश की। उनका प्रयास था कि यह विवाद समाप्त कर लिया जाए। मगर, अंग्रेजों ने कोई पहल नहीं की।
अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे

वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्या ने बताया कि अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे हैं। धर्मग्रंथों में महाभारत काल से भी पहले का वर्णन मिलता है। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक 1325 ई. के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब विविध कल्प तीर्थ में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी काशी के इतिहास को समेटा है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक तीर्थ चिंतामणि में मंदिर को लेकर वर्णन किया है।बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्ष में फैसला देते हुए कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर का रडार तकनीक से पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मंजूरी दे दी है। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी की अदालत ने बृहस्पतिवार को लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी के आवेदन को स्वीकार कर लिया।